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सोच पुनीत की

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डॉ पुनीत बिसारिया


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स्त्री शिक्षा का वर्तमान परिदृश्य

Posted On: 12 May, 2012  
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गाँधी जी का हिन्दुत्व और अस्पृश्यता

Posted On: 12 May, 2012  
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इक्कीसवीं सदी में प्रेमचंद की ज़रूरत

Posted On: 6 May, 2012  
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आज केंद्र में है स्त्री विमर्श

Posted On: 6 May, 2012  
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प्रकृति के तांडव से बचकर रहने की ज़रूरत है

Posted On: 6 May, 2012  
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भारतीय फिल्मों के सौ साल

Posted On: 6 May, 2012  
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भारत में आतंकवाद के तीन चेहरे

Posted On: 6 May, 2012  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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महादेवी वर्मा ने अपने प्रयत्नों से इलाहाबाद में प्रयाग महिला विद्यापीठ की स्थापना की। इसकी वे प्रधानाचार्य एवं कुलपति भी रहीं। महादेवी वर्मा पाठशाला में हिन्दी-अध्यापक से प्रभावित होकर ब्रजभाषा में समस्या पूर्ति भी करने लगीं। फिर तत्कालीन खड़ी बोली की कविता से प्रभावित होकर खड़ी बोली में रोला और हरिगीतिका छन्दों में काव्य लिखना प्रारम्भ किया। उसी समय माँ से सुनी एक करुण कथा को लेकर सौ छन्दों में एक खण्डकाव्य भी लिख डाला। 1932 में उन्होंने महिलाओं की प्रमुख पत्रिका ‘चाँद’ का कार्यभार सँभाला। प्रयाग में अध्यापन कार्य से जुड़ने के बाद हिन्दी के प्रति गहरा अनुराग रखने के कारण महादेवी वर्मा दिनों-दिन साहित्यिक क्रियाकलापों से जुड़ती चली गईं। उन्होंने न केवल ‘चाँद’ का सम्पादन किया वरन् हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयाग में ‘साहित्यकार संसद’ की स्थापना की। उन्होंने ‘साहित्यकार’ मासिक का संपादन किया और ‘रंगवाणी’ नाट्य संस्था की भी स्थापना की।महादेवी वर्मा का चरित्र चित्रण इससे पहले शायद ही इतना ज्यादा कभी पढने को मिला हो ! बहुत बहुत धन्यवाद , एक बेहतर और जानकारी से भरा लेखन देने के लिए

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वैदिक काल में स्त्रियों का उपयोग ऋण लेते समय बन्धक के रूप में भी किया जाता था। एक स्थल पर नारद और विष्णु सुझाव देते हैं कि स्त्रियों को गांवों की भांति उधार में दिया जा सकता है। ब्याज पर उधार में दिए जाने वाली वस्तुओं में स्वर्ण, अन्न और गायों के साथ स्त्रियों का भी उल्लेख आता है। यदि स्त्री को उधार के लिए लिया जाता था तो स्वामी को वापस लौटाते समय उधार काल में उससे पैदा हुई एक सन्तान भी वापस देनी होती थी। यदि उसने एकाधिक सन्तान पैदा की हो तो उधार देने वाला व्यक्ति अन्य सन्तानों को अपने पास रख सकता था।8 सम्भवतः इसी कारण पी0वी0 काणे जी लिखते हैं, ‘‘ऋग्वेद (1.109.12), मैत्रायाणी संहिता (1.10.1), निरूक्त (6.9,1.3) तैत्तिरीय ब्राह्मण (1.7,10) आदि के अवलोकन से यह विदित होता है कि प्राचीन काल में विवाह के लिए लड़कियों का क्रय-विक्रय होता था।‘‘ उनका निष्कर्ष है कि वैदिक काल में स्त्रियां बहुत नीची दृष्टि से देखी जाती थीं। उन्हें सम्पत्ति में कोई भाग नहीं मिलता था तथा वे आश्रित थीं। सुन्दर ऐतहासिक और ज्ञानवर्धक लेखन

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डॉ. पुनीत विसारिया जी, सच तो यह है कि इतिहास कभी भी इतिहास के रूप लिखा ही नहीं गया, बल्कि जो लिखना था वह लिखा गया | यही बात इतिहास पढ़ाने पर भी लागू होती है, इतिहास में से भी वही पढ़ाया जाता है, जो पढ़ाया जाना है | सामान्यतया यही विदित इतिहास रहा है कि वैदिक काल में स्त्रियाँ स्वतंत्र थीं और उन्हें सम्मान प्राप्त था | आप के द्वारा जुटाए उद्धरणों से स्पष्ट है कि मध्य काल से नहीं,बल्कि प्राचीन काल से ही स्त्रियाँ अपमान, अशिक्षा, अपवित्रता आदि का शिकार थीं | पर दोनों तरह के उदाहरण अपवाद के ही उदाहरण हैं | मात्र कुछ उदाहरणों से निषकर्ष गढ़ने की परम्परा पर विराम लगाना चाहिए | शोधपरक, उद्धरणों से परिपुष्ट, नवीन जानकारी से युक्त, ज्ञानवर्धक आलेख के लिए साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

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