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सोच पुनीत की

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विदेश नीति में हिन्दी

Posted On: 16 Sep, 2015 Others में

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आपको याद होगा कि जब राज कपूर की फिल्म आवारा आयी थी, तो उस समय उसके एक गीत ‘आवारा हूँ’ से भारत की पहचान जुड़ गयी थी. इस गीत की लोकप्रियता का यह आलम था कि उस दौरान राज कपूर जिस देश में भी जाते थे, उस देश में वहां की जनता उनका स्वागत ‘आवारा हूँ’ कहकर ही किया करती थी. वैश्विक धरातल पर विदेशियों के बीच उन्माद के स्तर पर हिन्दी की लोकप्रियता का यह सबसे पहला बड़ा प्रमाण है. इसके बाद हिन्दी का दिग्विजयी रथ रुका नहीं और वह आगे सरपट दौड़ता गया जिसका परिणाम सम्पूर्ण विश्व में हिन्दी के प्रति प्रेमभाव के रूप में आज हमारे समक्ष है. हिन्दी की लोकप्रियता और सहज स्वीकारोक्ति की एक बड़ी वजह यह भी रही कि इसने लिपि, शुद्धता या क्लिष्टता के बंधन को कभी स्वीकार नहीं किया और अन्य भाषाओँ के शब्दों को भी स्नेह से गले लगाकर अपना बना लिया. जिस भाषा ने अपना नामकरण ही विदेशी शब्द से किया हो उसके लिए शुद्धता का आग्रह बहुत अधिक सुकर था भी नहीं. यही बात ‘विदेश में हिन्दी’ के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है, बल्कि विदेशों में तो हिन्दी ने लिपि के बंधन को भी अस्वीकारते हुए अपनी यशोगाथा के नए शिखरों का संस्पर्श किया है. भारत के कॉरपोरेट जगत में भी रोमन लिपि की हिन्दी ने हिन्दी के विस्तार में सहायता की है.
भारत की विदेश नीति में हिन्दी का इतिहास उस समय शुरू हुआ, जब 4 अक्टूबर सन 1977 को जनता पार्टी सरकार के तत्कालीन विदेश मंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी में भाषण देकर उपस्थित जनसमुदाय को चमत्कृत कर दिया था. संयुक्त राष्ट्र संघ के पहले हिन्दी उद्बोधन में अटल जी ने अपने भाषण के अंत में जो बात कही थी, वह भारतीय विदेश नीति का सदियों से मूल मन्त्र रहा है. उन्होंने कहा था,” हमारी कार्यसूची का एक सर्वस्पर्शी विषय जो आगामी अनेक वर्षों और दशकों में बना रहेगा, वह है मानव का भविष्य. मैं भारत की ओर से इस महासभा को आश्वासन देना चाहता हूँ कि हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव के कल्याण तथा उसके गौरव के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे नहीं रहेंगे.”
कहने की आवश्यकता नहीं कि यही नीति भारत की विदेश नीति की आधारशिला है और वस्तुतः इसी समय से भारत की विदेश नीति में हिन्दी को एक खास अहमियत दी जाने लगती है. हालाँकि इससे पूर्व 10-14 जनवरी, सन 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की प्रेरणा से राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के सहयोग से हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन में भारत की विदेश नीति में हिन्दी के प्रभाव की प्रारंभिक स्वीकार्यता देखने को मिली थी. इस सम्मेलन की आयोजन समिति के अध्यक्ष तत्कालीन उपराष्ट्रपति बी डी जत्ती थे और मुख्य अतिथि मारीशस के राष्ट्रपति शिवसागर रामगुलाम थे. इस सम्मेलन में पहली बार हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने की मांग की गयी थी. इसके बाद क्रमशः ये सम्मेलन सन 1976 में पोर्ट लुई (मारीशस), 1983 में दिल्ली (भारत), 1993 में पोर्ट लुई (दिल्ली), 1996 में पोर्ट ऑफ़ स्पेन (त्रिनिदाद एवं टोबैगो), 1999 में लन्दन (ब्रिटेन), 2003 में पारामारिबो (सूरीनाम), 2007 में न्यूयॉर्क (अमेरिका) और सन 2012 में जोहान्सबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में संपन्न हुए. दसवां विश्व हिन्दी सम्मेलन भोपाल में हो रहा है. अब तक हुए सभी आयोजनों में भारत सरकार की सक्रिय सहभागिता रही है और विदेशों में आयोजित हिन्दी सम्मेलनों की अभूतपूर्व सफलता को देखते हुए भारत सरकार ने अपनी विदेश नीति में हिन्दी को प्रमुख स्थान दिया है. तीसरे विश्व हिन्दी सम्मेलन के समापन समारोह की मुख्य अतिथि के रूप में मंचस्थ महीयसी महादेवी वर्मा ने भारत के कार्यालयों में हिन्दी की दुर्दशा का खाका खींचते हुए कहा था, “भारत के सरकारी कार्यालयों में हिन्दी के कामकाज की स्थिति उस रथ जैसी है जिसमें घोड़े आगे की बजाय पीछे जोत दिए गए हों.”
महादेवी वर्मा जी की इस दो टूक टिप्पणी का सकारात्मक प्रभाव पड़ा और चतुर्थ विश्व हिन्दी सम्मेलन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि हिन्दी को विश्व मंच पर उचित स्थान दिलाने में शासन और जनसमुदाय विशेष प्रयत्न करे. सम्मेलन के सभी प्रतिनिधियों से यह अपील की गई कि वे अपने अपने देशों की सरकारों से संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा बनाने हेतु समर्थन जुटाएं.
अटल जी के संयुक्त राष्ट्र संघ में दिए गए ऐतिहासिक हिन्दी उद्बोधन के बाद भारत के शासकों को विदेश नीति में हिन्दी की अहमियत का अहसास हुआ और इसके बाद प्रायः सभी प्रधानमंत्रियों ने किसी न किसी स्तर पर विदेश नीति के अहम अंग के रूप में हिन्दी के महत्त्व को स्वीकार किया. अहिन्दी भाषी प्रधानमंत्रियों पी वी नरसिंह राव और एच डी देवेगौड़ा ने भी हिन्दी के महत्त्व को विदेश नीति में मान्यता दी. राव ने अनेक अवसरों पर हिन्दी में न सिर्फ उद्बोधन दिया, अपितु हिन्दी के महत्त्व को भी माना. देवेगौड़ा ने तो हिन्दी सीखने के लिए एक शिक्षक रखा था. वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो अपनी प्रत्येक विदेश यात्रा में भारतीयों से मुलाकात में तथा अन्य अनेक अवसरों पर हिन्दी में भाषण देकर अपनी विदेश नीति में हिन्दी के महत्त्व को बार- बार रेखांकित किया है.
विदेश नीति के मोर्चे पर हिन्दी के महत्त्व को समझते हुए भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् ने विश्व के अनेक देशों के विश्वविद्यालयों में देशी तथा विदेशी हिन्दी छात्रों को पढ़ाने हेतु भारतीय अध्ययन पीठ स्थापित किये हैं, जिनमें हिन्दी अध्यापन को विशेष स्थान दिया गया है. वर्तमान समय में ये पीठें भारत की सांस्कृतिक पहचान को दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रही हैं और भारत की विदेश नीति में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रही हैं.
मई 2014 में केंद्र में नयी सरकार का गठन होने के बाद से भारत की विदेश नीति में हिन्दी के प्रति विशेष आग्रह परिलक्षित होता है. प्रधानमंत्री मोदी जी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपना पहला भाषण हिन्दी में देकर यह स्पष्ट कर दिया था कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के मामले में वे अटल जी की राह का ही अनुसरण करेंगे. हिन्दी के दो प्रबल समर्थकों पंडित मदनमोहन मालवीय तथा अटलबिहारी वाजपेयी को भारत रत्न देने में भी यही सदाशयता कहीं न कहीं अवश्य प्रकट होती है. वर्तमान सरकार जिन नई नीतियों और कार्यक्रमों के माध्यम से देश को प्रगति पथ पर अग्रसर करना चाहती है, उनमें हिन्दी तथा हिन्दीभाषियों की बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है. विशेषकर मेक इन इण्डिया, स्किल डेवलपमेंट मिशन, सांस्कृतिक सबंधों की मजबूती तथा आधारभूत ढांचे के विकास में सहयोग जैसे मूलभूत मुद्दों हेतु हिन्दीभाषियों का प्रवासी कॉकस सफलता के नए सोपान स्थापित कर सकता है. भारत सरकार को भी इसका अहसास है, इसीलिये 10 जनवरी, सन 2015 को विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी ने विदेश नीति के मामले में अपनी भाषा नीति को स्पष्ट करते हुए कहा था,” जहाँ तक मेरी अपनी भाषा नीति का संबंध है, मैंने सभी अधिकारियों को कह रखा है, कि जब भी कोई द्विपक्षीय वार्ता के लिए कोई विदेशी अतिथि आएगा, अगर वो अंग्रेज़ी जानता है तो मैं अंग्रेज़ी में बात करुँगी क्योंकि मैं बोलूं, वो समझे..वो बोले, मैं समझूँ.. भाषांतरकार की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। लेकिन अगर कोई जापानी में बोलता है, चीनी में बोलता है, रूसी में बोलता है, स्पेनिश में बोलता है, जर्मन में बोलता है, अरेबिक में बोलता है, फ्रेंच में बोलता है…तो मुझ पर यह बाध्यता मत करिए कि मैं अंग्रेज़ी में बात करूँ। फिर मैं भी हिंदी में बात करुँगी, ताकि वो यह प्रभाव लेकर जाए कि भारत की भाषा हिंदी है, अंग्रेज़ी नहीं है। और मैंने उसी दिन कहा कि इन हर भाषाओं में से हिंदी के भाषांतरकार तैयार करो। अगर नहीं उपलब्ध हैं तो तैयार करो।”
उपर्युक्त तथ्यों के अलोक में कहा जा सकता है कि भारत की विदेश नीति में हिन्दी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है. सर्वप्रथम सरकार को संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को उसका चिर प्रतीक्षित स्थान दिलाना चाहिए और विदेशों में हिन्दी के व्याख्यानों, कार्यक्रमों की वृहद् श्रृंखला आयोजित करनी चाहिए, जिससे हिन्दी के माध्यम से प्रवासी और विदेशी नागरिक भी भारत के साथ जुड़ सकें. इसी प्रकार विदेशी हिन्दी विशेषज्ञों के व्याख्यानों को भारत में आयोजित करने की व्यवस्था हो, जिससे अधिकाधिक विदेशियों में हिन्दी के प्रति अभिरुचि जाग्रत हो और वे भारत के भाषाई राजदूत बनकर उन देशों के साथ भारत के सम्बन्धों को प्रगाढ़ बनाने में सहायक हो सकें.
यह लेख भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद की पत्रिका गगनांचल के विश्व हिन्दी सम्मेलन विशेषांक में प्रकाशित हुआ है, जिसका विमोचन 10 सितम्बर 2015 को दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का भोपाल में उद्घाटन करते हुए प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने किया.
• वरिष्ठ प्राध्यापक- हिन्दी विभाग, नेहरू पी जी कॉलेज, ललितपुर, उत्तर प्रदेश 284403
• सम्पर्क 09450037871



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