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सोच पुनीत की

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वर्तमान समय में विश्व को गाँधी की ज़रूरत है

Posted On: 24 Jul, 2015 Others में

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जब-जब समाज में हिंसा, पराधीनता और राजनातिक मूल्यों में कमी की बात की जाएगी, तब तब हमें गांधीजी की याद करनी ही होगी. चाहे नेल्सन मंडेला हों, या मार्टिन लूथर किंग जूनियर, आंग सान सू की हों या बराक ओबामा. शांति और समानता की चर्चा करने वाला प्रत्येक व्यक्ति गाँधी की चर्चा किये बगैर अपनी बात को पूर्ण नहीं बना सकता. यही कारण है कि आज आतंक से कराह रही मानवता को रह रहकर पीछे लौटना पड़ता है और गाँधी के आदर्शों की ओर प्रेरित करने हेतु लोगों का आह्वान करना पड़ता है.
ऐसा क्या था उस लंगोटी वाले नंगे फकीर में, जिसने उसके जाने के आज 67 बरस बीतने के बावजूद उसे लोगों के दिलों में जीवित कर रखा है? वास्तव में यह गांधीजी की भारतीय मूल्यों में गहरी आस्था थी, जिसने उन्हें एक साधारण व्यक्ति से करिश्माई व्यक्ति में बदल दिया. डी जी तेंदुलकर ने बिहार में सन 1922 में बिहार में गाँधी जी को मिले अभूतपूर्व समर्थन की चर्चा करते हुए लिखा है, “अभूतपूर्व दृश्य देखने को मिले. बिहार के गाँव में जहाँ गाँधी और उनके साथी पटरी पर खड़ी ट्रेन में मौजूद थे, एक वृद्धा उनको ढूँढ़ते हुए आयी और बोली, महाराज, मेरी उम्र अब एक सौ चार बरस हो चली है और नजर भी कम आता है. मैंने अनेक धामों की यात्रा की है. अपने घर में मेरे दो मन्दिर हैं. जिस प्रकार राम और कृष्ण दो अवतार हुए थे, सुना है इसी तरह गाँधी भी अवतीर्ण हुए हैं.”1
यह गांधी जी के विचारों की सर्व स्वीकृति थी, जिसने उस अशिक्षित वृद्धा के अंतर्मन में भी गांधी जी के प्रति ऐसा आदम्य विश्वास पैदा कर दिया. वस्तुतः गांधीजी ने भारतीय संस्कृति, पाश्चात्य दार्शनिकों के कुछ विचारों तथा स्वयं की नवोन्मेषी सोच के सम्मिश्रण से एक ऐसी विचारधारा विकसित की, जिसने उन्हें भारत ही नहीं वरन समस्त विश्व की पीड़ित मानवता को एक आशा की किरण दे दी. सन 1947 में भारत की आज़ादी के बाद गांधीजी के रस्ते पर चलकर ही अनेक देशों को आज़ादी प्राप्त हुई और कई देशों को रंगभेद के अमानवीय वर्ताव से मुक्ति हासिल हुई.
अनेक विद्वानों ने गांधीजी को एक ‘दार्शनिक अराजकतावादी’ कहा है2, क्योंकि गांधीजी एक ऐसा राज्यविहीन आदर्शवादी समाज चाहते थे, जिसमें सत्य और अहिंसा के सिद्धांत प्रबल हों. इसे ही वे रामराज्य की संज्ञा देते थे.
प्रमुख सर्वोदयकर्मी और गांधीवादी विदुषी निर्मला देशपांडे की इस सन्दर्भ में यह टिप्पणी महत्त्वपूर्ण है कि,” पहले हमें गाँधी जी की बातों को समझाने के लिए घंटों भाषण देना पड़ता था, लेकिन आज लोग हमसे गाँधी के बारे में घंटों बात करते हैं.”3
यही कारण है कि कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ की संज्ञा से विभूषित किया. उनके सन्देश एक देश अथवा जनता के लिए ही प्रासंगिक नहीं हैं. संघर्ष एवं घृणा से आपूरित विश्व में उन्होंने मानवता को एक उच्च कोटि का तथा बेहतर जीवन जीने का तरीका सिखलाया. उन्होंने कहा था, “मेरा मिशन केवल भारतीय मानवता को भाईचारे का सन्देश देना मात्र नहीं है, न ही मेरा मिशन केवल भारत को आजाद कराना है लेकिन भारत को स्वतंत्र कराकर मैं लोगों को यह अहसास कराना चाहता हूँ कि वे मनुष्यों में भाईचारे के मिशन को आगे बढायें.”4
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने गांधीजी को श्रद्धांजलि देते हुए कहा था,“यदि हम मानव मात्र के रूप में शांतिपूर्ण एवं प्रसन्नतापूर्वक जीवन जीना चाहते हैं तो हमें गांधीजी द्वारा बताए गए रास्ते पर चलना ही होगा क्योंकि इसी में हम सबकी भलाई है और सम्पूर्ण विश्व का कल्याण है.”5
सन्दर्भ सूची :
1- अमीन शहीद एवं पाण्डेय ज्ञानेंद्र, निम्नवर्गीय प्रसंग, भाग -1, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1995, पृष्ठ 186 से उद्धृत.
2- बिसारिया, डॉ पुनीत, युवाओं की दृष्टि में गाँधी पुस्तक में ‘गाँधी: अराजकतावादी या समझौतापरस्त अराजकतावादी!’ निर्मल पब्लिकेशन्स, दिल्ली, 2009, पृष्ठ 125.
3- निर्मला देशपांडे, गाँधी को कौन मार सकता है, दैनिक भास्कर, इंदौर, 2 अक्टूबर 2006.
4- शर्मा, आई सी, एथिकल फिलोसफी ऑफ़ इंडिया, जार्ज अलेन एंड अनविन, लन्दन, 1965,पृष्ठ 335.

5- डॉ राजेन्द्र प्रसाद, लीगेसी ऑफ़ गाँधी,एशिया पब्लिकेशन हाउस, मुम्बई, 1962, पृष्ठ संख्या 65.

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