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सोच पुनीत की

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मोहल्ल्ला अस्सी पर विवाद बेवजह

Posted On: 1 Jul, 2015 Others में

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मोहल्ला अस्सी की रिलीज़ पर दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट द्वारा अगले आदेशों तक रोक लगा दिए जाने से एक बार पुनः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक भावनाओं के आहत होने का सवाल सतह पर आ गया है. अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब फ्रेंच कार्टून पत्रिका पर आतंकवादियों ने हमला बोल दिया था और धार्मिक भावनाओं के आहत होने के नाम पर अनेक लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया था. सलमान रश्दी, तसलीमा नसरीन, एम् ऍफ़ हुसैन, नरेंद्र मोहन आदि अनेक लेखक साहित्यकार फ़िल्मकार धर्म के आखेट होकर अपनी कृतियों पर पाबंदी लगवाने या फतवे जारी होने पर छुपकर रहने या देश निकाला का दंश सहने को विवश हुए हैं.
आश्चर्य की बात है कि इक्कीसवीं सदी के डेढ़ दशक बीत जाने के बाद भी यह धार्मिक भावनाओं के आहत होने के नाम पर अपनी रोटियां सेंकने का यह कार्य बदस्तूर जारी है. चाहे ईश निंदा और काफिरों के विरोध के नाम पर इस्लामिक देशों में हो रहा आइसिस का खूनी खेल हो या एक फिल्म के छोटे से दृश्य में कही गयी छोटी सी बात का विरोध हो, इनमें भला अंतर क्या रह जाता है ? अंतर है तो इतना कि वहां यह खेल खूनी है तो यहाँ यह मानसिक तौर पर हिंसक या राजनैतिक है.
बेहतर तो यह होता कि डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी की यह फिल्म अपनी निर्धारित तिथि 3 जुलाई को रिलीज़ होती और इसके गुण दोष के आधार पर दर्शक इसे स्वीकारते या नकारते. ध्यातव्य है कि यह फिल्म 2004 में आये डॉ काशीनाथ सिंह के चर्चित उपन्यास काशी का अस्सी पर आधारित है और यह उपन्यास भी प्रकाशन के बाद इन्हीं कारणों से चर्चा में रहा था. जो लोग बनारस को भली भांति जानते हैं, वे कभी भी इस उपन्यास या फिल्म का विरोध कर ही नहीं सकते क्योंकि जो बेलौसपन बनारस की पहचान रहा है, वह वहां की गलियों और जुमलों के बगैर कभी पूरा नहीं हो सकता. रही बात धार्मिक भावनाओं की तो ये तो किसी भी बात पर आजकल आहत हो जाया करती हैं, कभी योग के नाम पर तो कभी भोग (समलैंगिकता) के नाम पर तो कभी किसी फिल्म के दृश्यों से. अब हमें सोचना ही होगा कि क्या हमारी धार्मिक मान्यताओं की दीवारें इतनी कमजोर और जर्जर हैं कि उन्हें कोई भी फिल्म, विचार या पुस्तक अपने ज़रा से धक्के से गिरा सकती है. आज समूची दुनिया को इस बारे में गंभीरतापूर्वक मनन करनेकी आवश्यकता है कि कहीं हम धर्म के नाम पर दकियानूसी मुल्लों, पंडितों के बहकावे में आकर जीने और जीने देने के मूलभूत अधिकारों पर तो कुठाराघात नहीं कर रहे? जहाँ तक इस फिल्म के कुछ दृश्यों का सवाल है तो उन दृश्यों में कहीं भी हिन्दू धर्म या अन्य किसी धर्म के विरुद्ध कोई बात नहीं कही गई है. भगवन शंकर के दृश्यों पर आपत्ति के विषय में मेरा इतना ही कहना है कि लोकगीतों में हिन्दू देवी देवताओं पर आक्षेप करने और उन्हें मानवीय धरातल पर खड़ा करने की चिर प्राचीन परम्परा रही है और इस नज़रिए से देखने पर यह आपत्ति स्वतः ख़ारिज हो जाती है. न्यायालयों को भी प्रत्येक विषय पर संज्ञान लेने की जगह कुछ निर्णय जनता की अदालत पर भी छोड़ देने चाहिए.

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