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सोच पुनीत की

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याद फणीश्वरनाथ की

Posted On: 4 Mar, 2014 Others में

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आज आंचलिक लोक के अमर शिल्पी फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की 93 वीं जयंती है।उनका जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया ज़िला के ‘औराही हिंगना’ गांव में हुआ था। रेणु के पिता शिलानाथ मंडल संपन्न कांग्रेसी थे। थे। उन्होंने भारत के स्वाधीनता संघर्ष में भाग लिया था। रेणु का बचपन भी आज़ादी की लड़ाई को देखते समझते बीता। रेणु ने स्वयं लिखा है – मेरे पिताजी किसान थे और इलाके के स्वराज-आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता। खादी पहनते थे, घर में चरखा चलता था।” स्वाधीनता संघर्ष की चेतना रेणु में उनके पारिवारिक वातावरण से आयी थी। रेणु भी बचपन और किशोरावस्था में ही देश की आज़ादी की लड़ाई से जुड़ गए थे। 1930-31 ई. में जब रेणु ‘अररिया हाईस्कूल’ के चौथे दर्जे में पढ़ते थे तभी महात्मा गाँधी की गिरफ्तारी के बाद अररिया में हड़ताल हुई, स्कूल के सारे छात्र भी हड़ताल पर रहे। रेणु ने अपने स्कूल के असिस्टेंट हेडमास्टर को स्कूल में जाने से रोका। रेणु को इसकी सज़ा मिली, लेकिन इसके साथ ही वे इलाके के बहादुर सुराजी के रूप में प्रसिद्ध हो गए। रेणु की प्रारंभिक शिक्षा ‘फॉरबिसगंज’ तथा ‘अररिया’ में हुई। रेणु ने प्रारम्भिक शिक्षा के बाद मैट्रिक नेपाल के ‘विराटनगर’ के ‘विराटनगर आदर्श विद्यालय’ से कोईराला परिवार में रहकर किया। रेणु ने इन्टरमीडिएट काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1942 में किया और उसके बाद वह स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। 1950 में रेणु ने ‘नेपाली क्रांतिकारी आन्दोलन’ में भी भाग लिया। बाद में रेणु पढ़ने के लिए बनारस चले गये। बनारस में रेणु ने ‘स्टुडेंट फेडरेशन’ के कार्यकर्ता के रूप में भी कार्य किया। आगे चलकर रेणु समाजवाद से प्रभावित हुए। 1938 ई० में सोनपुर, बिहार में ‘समर स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स’ में रेणु शामिल हुए।
एक लेखक के तौर पर उन्हें सर्वाधिक ख्याति उपन्यास मैला आँचल से मिली।नलिन विलोचन शर्माने मैला आँचल के विषय में लिखा था –  ‘मैला आंचल’ ‘रेणु’ का प्रथम उपन्यास है। यह ऐसा सौभाग्यशाली उपन्यास है जो लेखक की प्रथम कृति होने पर भी उसे ऐसी प्रतिष्ठा प्राप्त करा दे कि वह चाहे तो फिर कुछ और न भी लिखे । ऐसी कृति से वह अपने लिए ऐसा प्रतिमान स्थिर कर देता है जिसकी पुनरावृत्ति कठिन होती है । ‘मैला आँचल’ गत वर्ष का ही श्रेष्ठ उपन्यास नहीं है, वह हिन्दी के दस श्रेष्ठ उपन्यासों में सहज ही परिगणनीय है। स्वयं मैंने हिन्दी के दस श्रेष्ठ उपन्यासों की जो तालिका प्रकाशित कराई है उसमें उसे सम्मिलित करने में मुझे कठिनाई न होगी। मैं किसी द्विधा के बिना एक उपन्यास को हटाकर इसके लिए जगह बना सकता हूँ ।”
फणीश्वरनाथ रेणु ने 1936 के आसपास से कहानी लेखन की शुरुआत की थी। उस समय कुछ कहानियाँ प्रकाशित भी हुई थीं, किंतु वे किशोर रेणु की अपरिपक्व कहानियाँ थी। 1942 के आंदोलन में गिरफ़्तार होने के बाद जब वे 1944 में जेल से मुक्त हुए, तब घर लौटने पर उन्होंने ‘बटबाबा’ नामक पहली परिपक्व कहानी लिखी। ‘बटबाबा’ ‘साप्ताहिक विश्वमित्र’ के 27 अगस्त 1944 के अंक में प्रकाशित हुई। रेणु की दूसरी कहानी ‘पहलवान की ढोलक’ 11 दिसम्बर 1944 को ‘साप्ताहिक विश्वमित्र’ में छ्पी। 1972 में रेणु ने अपनी अंतिम कहानी ‘भित्तिचित्र की मयूरी’ लिखी। उनकी अब तक उपलब्ध कहानियों की संख्या 63 है। ‘रेणु’ को जितनी प्रसिद्धि उपन्यासों से मिली, उतनी ही प्रसिद्धि उनको उनकी कहानियों से भी मिली। ‘ठुमरी’, ‘अगिनखोर’, ‘आदिम रात्रि की महक’, ‘एक श्रावणी दोपहरी की धूप’, ‘अच्छे आदमी’, ‘सम्पूर्ण कहानियां’, आदि उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं।
फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ की कहानी
उनकी कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम’ पर आधारित फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ ने भी उन्हें काफ़ी प्रसिद्धि दिलवाई। इस फ़िल्म में राजकपूर और वहीदा रहमान ने मुख्य भूमिका में अभिनय किया था। ‘तीसरी क़सम’ को बासु भट्टाचार्य ने निर्देशित किया था और इसके निर्माता सुप्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र थे। यह फ़िल्म हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर मानी जाती है। कथा-साहित्य के अलावा उन्होंने संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोर्ताज आदि विधाओं में भी लिखा। उनके कुछ संस्मरण भी काफ़ी मशहूर हुए। ‘ऋणजल धनजल’, ‘वन-तुलसी की गंध’, ‘श्रुत अश्रुत पूर्व’, ‘समय की शिला पर’, ‘आत्म परिचय’ उनके संस्मरण हैं। इसके अतिरिक्त वे ‘दिनमान पत्रिका’ में रिपोर्ताज भी लिखते थे। ‘नेपाली क्रांति कथा’ उनके रिपोर्ताज का उत्तम उदाहरण है।
अपने प्रथम उपन्यास मैला आंचल के लिये उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
रेणु सरकारी दमन और शोषण के विरुद्ध ग्रामीण जनता के साथ प्रदर्शन करते हुए जेल गये। रेणु ने आपातकाल का विरोध करते हुए अपना ‘पद्मश्री’ का सम्मान भी लौटा दिया। इसी समय रेणु ने पटना में ‘लोकतंत्र रक्षी साहित्य मंच’ की स्थापना की। इस समय तक रेणु को ‘पैप्टिक अल्सर’ की गंभीर बीमारी हो गयी थी। लेकिन इस बीमारी के बाद भी रेणु ने 1977 ई. में नवगठित जनता पार्टी के लिए चुनाव में काफ़ी काम किया। 11 अप्रैल 1977 ई. को रेणु उसी ‘पैप्टिक अल्सर’ की बीमारी के कारण चल बसे।
रेणु  की अमर कृतियां
1 – उपन्यास
मैला आंचल 1954, परती परिकथा 1957, जूलूस 1965, दीर्घतपा 1964 (जो बाद में कलंक मुक्ति (1972) नाम से प्रकाशित हुई), कितने चौराहे 1966, पल्टू बाबू रोड 1979
2 – कथा-संग्रह
आदिम रात्रि की महक 1967, ठुमरी 1959, अगिनखोर 1973, अच्छे आदमी 1986
3 – संस्मरण
आत्म परिचय, समय की शिला पर
4 – रिपोर्ताज
ऋणजल धनजल 1977, नेपाली क्रांतिकथा 1977, वनतुलसी की गंध 1984, एक श्रावणी दोपहरी की धूप 1984, श्रुत अश्रुत पूर्व 1986
5 – कहानियां
मारे गये गुलफाम, एक आदिम रात्रि की महक, लाल पान की बेगम, पंचलाइट, तबे एकला चलो रे, ठेस, संवदिया,
6 – ग्रंथावली
फणीश्वरनाथ रेणु ग्रंथावली
अन्य पुस्तकें
वनतुलसी की गंध 1984, एक श्रावणी दोपहरी की धूप 1984, श्रुत अश्रुत पूर्व 1986, अच्छे आदमी 1986, एकांकी के दृश्य 1987, आत्म परिचय 1988, कवि रेणु कहे 1988, उत्तर नेहरू चरितम्‌ 1988, फणीश्वरनाथ रेणु: चुनी हुई रचनाएँ 1990, समय की शिला पर 1991, फणीश्वरनाथ रेणु अर्थात्‌ मृदंगिये का मर्म 1991,प्राणों में घुले हुए रंग 1993, रेणु की श्रेष्ठ कहानियाँ 1992
इस अमर सरजक को कोटि -कोटि नमन। पेश है रेणु के समस्त साहित्य को पढ़ने के लिए एक महत्त्वपूर्ण लिंक
http://phanishwarnathrenu.com/renu_sahitya.php

आज आंचलिक लोक के अमर शिल्पी फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की 93 वीं जयंती है।उनका जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया ज़िला के ‘औराही हिंगना’ गांव में हुआ था। रेणु के पिता शिलानाथ मंडल संपन्न कांग्रेसी थे। थे। उन्होंने भारत के स्वाधीनता संघर्ष में भाग लिया था। रेणु का बचपन भी आज़ादी की लड़ाई को देखते समझते बीता। रेणु ने स्वयं लिखा है – मेरे पिताजी किसान थे और इलाके के स्वराज-आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता। खादी पहनते थे, घर में चरखा चलता था।” स्वाधीनता संघर्ष की चेतना रेणु में उनके पारिवारिक वातावरण से आयी थी। रेणु भी बचपन और किशोरावस्था में ही देश की आज़ादी की लड़ाई से जुड़ गए थे। 1930-31 ई. में जब रेणु ‘अररिया हाईस्कूल’ के चौथे दर्जे में पढ़ते थे तभी महात्मा गाँधी की गिरफ्तारी के बाद अररिया में हड़ताल हुई, स्कूल के सारे छात्र भी हड़ताल पर रहे। रेणु ने अपने स्कूल के असिस्टेंट हेडमास्टर को स्कूल में जाने से रोका। रेणु को इसकी सज़ा मिली, लेकिन इसके साथ ही वे इलाके के बहादुर सुराजी के रूप में प्रसिद्ध हो गए। रेणु की प्रारंभिक शिक्षा ‘फॉरबिसगंज’ तथा ‘अररिया’ में हुई। रेणु ने प्रारम्भिक शिक्षा के बाद मैट्रिक नेपाल के ‘विराटनगर’ के ‘विराटनगर आदर्श विद्यालय’ से कोईराला परिवार में रहकर किया। रेणु ने इन्टरमीडिएट काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1942 में किया और उसके बाद वह स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। 1950 में रेणु ने ‘नेपाली क्रांतिकारी आन्दोलन’ में भी भाग लिया। बाद में रेणु पढ़ने के लिए बनारस चले गये। बनारस में रेणु ने ‘स्टुडेंट फेडरेशन’ के कार्यकर्ता के रूप में भी कार्य किया। आगे चलकर रेणु समाजवाद से प्रभावित हुए। 1938 ई० में सोनपुर, बिहार में ‘समर स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स’ में रेणु शामिल हुए।

एक लेखक के तौर पर उन्हें सर्वाधिक ख्याति उपन्यास मैला आँचल से मिली।नलिन विलोचन शर्माने मैला आँचल के विषय में लिखा था –  ‘मैला आंचल’ ‘रेणु’ का प्रथम उपन्यास है। यह ऐसा सौभाग्यशाली उपन्यास है जो लेखक की प्रथम कृति होने पर भी उसे ऐसी प्रतिष्ठा प्राप्त करा दे कि वह चाहे तो फिर कुछ और न भी लिखे । ऐसी कृति से वह अपने लिए ऐसा प्रतिमान स्थिर कर देता है जिसकी पुनरावृत्ति कठिन होती है । ‘मैला आँचल’ गत वर्ष का ही श्रेष्ठ उपन्यास नहीं है, वह हिन्दी के दस श्रेष्ठ उपन्यासों में सहज ही परिगणनीय है। स्वयं मैंने हिन्दी के दस श्रेष्ठ उपन्यासों की जो तालिका प्रकाशित कराई है उसमें उसे सम्मिलित करने में मुझे कठिनाई न होगी। मैं किसी द्विधा के बिना एक उपन्यास को हटाकर इसके लिए जगह बना सकता हूँ ।”

फणीश्वरनाथ रेणु ने 1936 के आसपास से कहानी लेखन की शुरुआत की थी। उस समय कुछ कहानियाँ प्रकाशित भी हुई थीं, किंतु वे किशोर रेणु की अपरिपक्व कहानियाँ थी। 1942 के आंदोलन में गिरफ़्तार होने के बाद जब वे 1944 में जेल से मुक्त हुए, तब घर लौटने पर उन्होंने ‘बटबाबा’ नामक पहली परिपक्व कहानी लिखी। ‘बटबाबा’ ‘साप्ताहिक विश्वमित्र’ के 27 अगस्त 1944 के अंक में प्रकाशित हुई। रेणु की दूसरी कहानी ‘पहलवान की ढोलक’ 11 दिसम्बर 1944 को ‘साप्ताहिक विश्वमित्र’ में छ्पी। 1972 में रेणु ने अपनी अंतिम कहानी ‘भित्तिचित्र की मयूरी’ लिखी। उनकी अब तक उपलब्ध कहानियों की संख्या 63 है। ‘रेणु’ को जितनी प्रसिद्धि उपन्यासों से मिली, उतनी ही प्रसिद्धि उनको उनकी कहानियों से भी मिली। ‘ठुमरी’, ‘अगिनखोर’, ‘आदिम रात्रि की महक’, ‘एक श्रावणी दोपहरी की धूप’, ‘अच्छे आदमी’, ‘सम्पूर्ण कहानियां’, आदि उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं।

फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ की कहानी

उनकी कहानी ‘मारे गए गुलफ़ाम’ पर आधारित फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ ने भी उन्हें काफ़ी प्रसिद्धि दिलवाई। इस फ़िल्म में राजकपूर और वहीदा रहमान ने मुख्य भूमिका में अभिनय किया था। ‘तीसरी क़सम’ को बासु भट्टाचार्य ने निर्देशित किया था और इसके निर्माता सुप्रसिद्ध गीतकार शैलेन्द्र थे। यह फ़िल्म हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर मानी जाती है। कथा-साहित्य के अलावा उन्होंने संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोर्ताज आदि विधाओं में भी लिखा। उनके कुछ संस्मरण भी काफ़ी मशहूर हुए। ‘ऋणजल धनजल’, ‘वन-तुलसी की गंध’, ‘श्रुत अश्रुत पूर्व’, ‘समय की शिला पर’, ‘आत्म परिचय’ उनके संस्मरण हैं। इसके अतिरिक्त वे ‘दिनमान पत्रिका’ में रिपोर्ताज भी लिखते थे। ‘नेपाली क्रांति कथा’ उनके रिपोर्ताज का उत्तम उदाहरण है।

अपने प्रथम उपन्यास मैला आंचल के लिये उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

रेणु सरकारी दमन और शोषण के विरुद्ध ग्रामीण जनता के साथ प्रदर्शन करते हुए जेल गये। रेणु ने आपातकाल का विरोध करते हुए अपना ‘पद्मश्री’ का सम्मान भी लौटा दिया। इसी समय रेणु ने पटना में ‘लोकतंत्र रक्षी साहित्य मंच’ की स्थापना की। इस समय तक रेणु को ‘पैप्टिक अल्सर’ की गंभीर बीमारी हो गयी थी। लेकिन इस बीमारी के बाद भी रेणु ने 1977 ई. में नवगठित जनता पार्टी के लिए चुनाव में काफ़ी काम किया। 11 अप्रैल 1977 ई. को रेणु उसी ‘पैप्टिक अल्सर’ की बीमारी के कारण चल बसे।

रेणु  की अमर कृतियां

1 – उपन्यास

मैला आंचल 1954, परती परिकथा 1957, जूलूस 1965, दीर्घतपा 1964 (जो बाद में कलंक मुक्ति (1972) नाम से प्रकाशित हुई), कितने चौराहे 1966, पल्टू बाबू रोड 1979

2 – कथा-संग्रह

आदिम रात्रि की महक 1967, ठुमरी 1959, अगिनखोर 1973, अच्छे आदमी 1986

3 – संस्मरण

आत्म परिचय, समय की शिला पर

4 – रिपोर्ताज

ऋणजल धनजल 1977, नेपाली क्रांतिकथा 1977, वनतुलसी की गंध 1984, एक श्रावणी दोपहरी की धूप 1984, श्रुत अश्रुत पूर्व 1986

5 – कहानियां

मारे गये गुलफाम, एक आदिम रात्रि की महक, लाल पान की बेगम, पंचलाइट, तबे एकला चलो रे, ठेस, संवदिया,

6 – ग्रंथावली

फणीश्वरनाथ रेणु ग्रंथावली

अन्य पुस्तकें

वनतुलसी की गंध 1984, एक श्रावणी दोपहरी की धूप 1984, श्रुत अश्रुत पूर्व 1986, अच्छे आदमी 1986, एकांकी के दृश्य 1987, आत्म परिचय 1988, कवि रेणु कहे 1988, उत्तर नेहरू चरितम्‌ 1988, फणीश्वरनाथ रेणु: चुनी हुई रचनाएँ 1990, समय की शिला पर 1991, फणीश्वरनाथ रेणु अर्थात्‌ मृदंगिये का मर्म 1991,प्राणों में घुले हुए रंग 1993, रेणु की श्रेष्ठ कहानियाँ 1992

इस अमर सरजक को कोटि -कोटि नमन। पेश है रेणु के समस्त साहित्य को पढ़ने के लिए एक महत्त्वपूर्ण लिंक

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepakbijnory के द्वारा
March 7, 2014

EK MAHAN VYAKTI KE BAARE ME MAHAAN JANKARI DENE WALA EK MAHAAN INSAAN HEE HO SAKTA HAI PUNEET JEE आपको सदर नमन

    April 30, 2014

    आपकी सराहना के बाद मेरे पास शब्द नहीं हैं, जिनसे मैं आपको आभार कह सकूँ Deepakbijnori ji

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 6, 2014

 फणीश्वर नाथ रेणु के बारे में कुछ तथ्य आपका आलेख पढ़ कर ज्ञात हुए,उनके रचे साहित्य का लिंक देने के लिए बहुत आभार ,आदरणीय पुनीत जी .


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