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सोच पुनीत की

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स्त्री विमर्श के कुछ सुलगते सवाल

Posted On: 20 Oct, 2013 Others में

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समाज सामाजिक सम्बन्धों का जटिल जाल होता है और इन सम्बन्धों का निर्माता स्वयं मनुष्य है। सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य ही समाज में संगठन एवं व्यवस्था स्थापित करते हुए इसे प्रगति एवं गतिशीलता की दिशा में ले जाने हेतु सदैव प्रयत्नशील रहा है, किन्तु पुरूष मनुष्य का अर्थ पुरूषत्व मान लिया गया और स्त्री को इस कोटि से बहिष्कृत कर दिया गया। इसलिए पुरूष स्वभावतः अहंकारी हो गया और वह सामाजिक परिवेश में अपनी स्थिति सर्वोच्च स्तर पर रखने हेतु उत्सुक हो गया। यही मनोभाव पुरूष को पुरूष वर्चस्ववाद की ओर ले गया। फलतः यदि उसने स्त्री को अधिक पढ़ी लिखी, जागरूक, तर्कशील तथा बुद्धिमान पाया तो उसने उससे अपने लिए अन्दर ही अन्दर खतरा महसूस किया। यही सर्वोच्चता के बनावटी सिंहासन पर खतरे को हर एक झूठे अहंकारवाद का शिकार व्यक्ति बर्दाश्त नहीं कर पाया, क्योंकि पुरूष स्वभावतः अहंकारी है। वह अपनी सामाजिक स्थिति को सर्वोच्चतम स्तर पर रखकर देखता है, और स्त्री को न्यूनतम स्तर पर रखना पसन्द करता है। यदि स्त्री अधिक पढ़ी लिखी, जागरूक, तर्कशील, बुद्धिमान है तो उसकी सर्वोच्चता को शायद खतरा पैदा हो जायेगा और झूठे अहंकारवाद का शिकार व्यक्ति यह सब कैसे सहन कर लेगा कि एक स्त्री की सामाजिक आर्थिक स्थिति उससे उच्च हो जाये या उसके बराबर हो। आज तक यही होता आया है और आज भी उसके भीतर यही सोलहवीं शताब्दी की ग्रंथि काम कर रही है कि स्त्री उसकी ‘निजी सम्पत्ति‘ है, लेकिन इस सम्पत्ति की गुणवत्ता को वह कतई बढ़ाना नहीं चाहता। उसे कमजोर करके रखने में ही वह अपनी सुरक्षा समझता है। पुरूष के मन में यह भय, असुरक्षा की भावना और स्त्री को दबाकर कुचलकर नियन्त्रण में रखने की स्त्री विरोधी दृष्टि सदियों से काम कर रही है। कल का राजतंत्र का राजा अपने हरम के लिये हजारों रानियाँ जुटा सकता था और आज का प्रजातंत्र का क्लिंटन व्हाइट हाउस में मोनिका लेविंस्की से यौनाचार कर सकता है। आज का मध्य और निम्न वर्ग भी कोई अपवाद नहीं है। वह कभी सौतन, कभी सहेली, कभी कजिन, कभी क्लाइंट, कभी कुलीग, कभी कुछ और बहाने बनाकर औरत के दिल में लगातार छेद करता आया है। अब विद्धत्जनों को ‘सौतियाडाह‘ एवं ‘‘फीमेल जेलिसी‘ के पुर्लिंगों ‘रकीबी-डाह‘ एवं ‘मेल-जेलिसी‘ को शब्दकोशीय मान्यता दे देनी चाहिये।
आज शिक्षित-कामकाजी, अधिकार-सजग, बौद्धिक, अर्थस्वतंत्र पत्नियों ने पुरूषों के लिए अनेक तथाकथित समस्याएँ खड़ी कर दी हैं। शिक्षा, राजनीति, खेल, धर्म, फिल्म, सेना, साहित्य, प्रशासन, मीडिया, संविधान और विज्ञान ने पत्नियों के लिए नए क्षितिज खोल दिये हैं। यह पति अनुगामिनी एक दिन सहगामिनी बन जाएगी, ‘आदम की पसली‘ से जन्म लेने वाली उसके सम्मुख हकूक की बात करेगी, पौराणिक कथाओं का अध्ययन करने वाली विश्वविद्यालयों में लॉ क्लासेज लगाएगी अथवा नारीवादी नारे उछालेगी, नाखूनों से लेकर सिर के बालों तक अपने को ढँककर तीर्थयात्राएँ करने वाली के प्राण ब्यूटी पॉर्लर में बस जायेंगे, बालाएँ अन्तरिक्ष को मुट्ठी में भर लेंगी, ऐसा तथाकथित पति परमेश्वरों ने कभी नहीं सोचा था।
जैसे-जैसे समाज में नारी की निरीह स्थिति में बदलाव आया है और वह अबला से सबला बनने की तरफ अग्रसर हुई है, वैसे-वैसे वह अपने अधिकारों के प्रति सजग और सचेत भी हुई है। परिणामस्वरूप पुरूष प्रधान समाज के बंधनों के खिलाफ उसने विद्रोह किया है। स्त्री के क्रांतिवीर तेवरों से परिवार की बुनियादें हिल गयी हैं और पारिवारिक विघटन भिन्न-भिन रूपों में समाज में पसरता जा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि पुरूष का परम्परागत मध्ययुगीन मानस स्त्री के मौलिक अधिकारों को स्वीकार नहीं कर पाता। वह उसे दबाना चाहता है और स्त्री अपनी गुलाम मानसिकता वाली सती-साध्वी, प्रेयसी या पति-परमेश्वरी छवि को तोड़कर अपना स्वतंत्र वजूद बनाना चाहती है। सामंती समाज में स्त्री माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, दासी आदि के रूप में थी-उसका अपना अलग वजूद नहीं था। आधुनिकता और बौद्धिकता के कारण वह अपने निजी स्वरूप और अपनी भावनों एवं इच्छाओं के प्रति सचेत हुई है। इस सजगता से उसकी आकांक्षाओं एवं पुरूष के वर्चस्ववादी अहं में टकराहट हुई है और यहीं से उनके सम्बन्धों में दरार पड़नी शुरू हो गयी है। अभी भी पुरूष स्त्री में परम्परागत कुललक्ष्मी/कुलवधू वाले स्वरूप को ही ढूँढता है, वह उसी का आकंाक्षी है। स्त्री का आधुनिक होना उसे बर्दाश्त नहीं है, ऐसी स्त्री को वह कुलटा और परिवार तोड़ने वाली आदि विशेषणों से नवाजने लगता है तथा उस पर चरित्रहीनता और स्वैराचार का आरोप लगाना शुरू कर देता है।
‘समर्पण लो सेवा का सार‘ कहकर सम्भवतः प्रसाद जी नारी के उसी सामंती वर्चस्व को प्रिय लगने वाले रूप को प्रोत्साहित करते हैं जो अपनी सारी आकंक्षाओं को पुरूष के चरणों में समर्पित कर देती है। अपने व्यक्तित्व को पुरूष के ‘महान‘ व्यक्तित्व में गला-घुला देती है, किन्तु आधुनिक स्त्री नर-नारी समता में विश्वास करती है। आज की नारी मानती है कि पुरूषों से वह किसी मायने में कम नहीं है। इस तथ्य को डॉ0 रमेश कुन्तल ‘मेघ‘ भी स्वीकार करते हैं – ‘‘आजकल नारी की ऐतिहासिक कर्म भूमिकाएँ (गृहिणी, धात्री, जननी, उपचारिका, सेविका, दासी आदि) जो शय्या और रसोई की धुरी में केन्द्रित थीं, अब बदल रही हैं। वह गृह के बाहर के काम-धन्धों को अपना रही हैं और गृह के अन्दर की नीरस मजदूरी से स्वतंत्र हो रही हैं। गृह की धुरी के ढीला होने के साथ ही विवाह की संस्था के अस्तित्व पर प्रश्न उठ रहे हैं अर्थात श्रम के विभाजन (घरे और बाहिरे) के सामंती आधार टूट रहे हैं और नई स्त्री ‘एक-यौनता की धारणा को स्वीकार कर रही है।‘‘
नारी जागरण का इतिहास
पूँजीवाद के उदय के साथ जीवन में आधुनिकता, बौद्धिकता का प्रवेश होता है, वैज्ञानिक दृष्टि का विकास होता है, स्त्री-पुरूष के समान अधिकारों की घोषणा होती है। इसके साथ ही हजारों सालों की बेड़ियां एक झटके के साथ टूट जाती हैं और स्त्री के कदम आत्मसम्मान की दिशा में बढ़ चलते हैं। स्त्री को कानूनी अधिकार मिलते हैं। सन् 1956 ई0 के पहले स्त्री का कानूनी अधिकार शून्य था। धीरे-धीरे अब उसमें बढ़ोत्तरी हो रही है और यहां से स्त्री की अपनी स्वतंत्र पहचान बननी शुरू होती है। स्त्री विमर्श की व्यापक जानकारी पाने के लिए विश्व स्तर पर घटने वाली चार महत्वपूर्ण घटनाओं को रेखांकित करना बेहद जरूरी हैः-
ऽ प्रथम, 1789 की फ्रांसीसी क्रांति, जिसने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसी चिरवांछित मानवीय आकांक्षाओं को नैसर्गिक मानवीय अधिकार की गरिमा देकर राजतंत्र और साम्राज्यवाद के बरक्स लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के स्वस्थ और अभीप्सित विकल्प को प्रतिष्ठित किया।
ऽ द्वितीय, भारत में राजा राममोहन राय की लम्बी जद्दोजहद के बाद सन् 1829 में सतीप्रथा का कानूनी विरोध हुआ, जिसने पहली बार स्त्री के अस्तित्व को एक मनुष्य के रूप में स्वीकारा।
ऽ तृतीय, सन् 1848 ई0 में सिनेका फालस न्यूयार्क में ग्रिम बहनों की रहनुमाई में आयोजित तीन सौ स्त्री-पुरूषों की सभा, जिसने स्त्री दासत्व की लम्बी श्रंृखला को चुनौती देते हुए स्त्री मुक्ति आन्दोलन की नींव रखी।
ऽ चतुर्थ, सन् 1867 में प्रसिद्ध अंग्रेज दार्शनिक और चिंतक जॉन स्टुअर्ट मिल द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट में स्त्री के वयस्क मताधिकार के लिए प्रस्ताव रखा जाना, जिसने स्त्री-पुरूष के बीच स्वीकारी जाने वाली अनिवार्य कानूनी और संवैधानिक समानता की अवधारणा को बल दिया।
संयुक्त रूप से ये चारों घटनायें एक तरह से विभाजक रेखाएँ हैं, जिनके एक ओर पूरे विश्व में स्त्री उत्पीड़न की लगभग एक सी सार्वभौमिक परम्परा है तो दूसरी ओर इससे मुक्ति की लगभग एक सी तड़प और अकुलाहट भरी संघर्ष कथा है।
भारतीय सन्दर्भ में स्त्री-विमर्श दो विपरीत धु्रवों पर टिका है। एक ओर परम्परागत भारतीय नारी की छवि है, जो सीता और सावित्री जैसे मिथकों में अपना मूर्त रूप पाती है, जिसे पश्चिम ‘होम मेकर‘ का नाम देता है, तो दूसरी ओर घर परिवार तोड़ने वाली स्वार्थी और कुलटा रूप में विख्यात तथाकथित आधुनिका एवं पाश्चात्य नारी की छवि है जो अक्सर सातवें-आठवें दशक की पुरानी फिल्मों में खलनायिका के रूप में उकेरी जाती है, और जिसे पाश्चात्य शब्दावली में ‘होम ब्रेकर‘ कहा जा सकता है।
साहित्य-जीवन की भावनात्मक अभिव्यक्ति होते हुए भी भावनाओं द्वारा अनुशासित नहीं होता। मूलतः वह बीज रूप में विचार से बंधा होता है, जिसका पल्लवन-पुष्पन भविष्य में होता है तो जड़ों का जटिल जाल सुदूर अतीत तक चला जाता है। अपने भौतिक अस्तित्व से ऊपर उठकर विराट को महसूसने की क्षमता ही लेखक के ज्ञान और संवेदना को उन्मुक्त और धनीभूत करते हुए विजन का रूप दे डालती है। यह विजन ही मुक्तिबोध के शब्दों में ज्ञान को ‘संवेदनात्मक ज्ञान‘ और संवेदना को ‘ज्ञानात्मक संवेदन‘ का रूप दे रचना में वांछित बौद्धिक संयम और अनुशासन बनाए रखता है। आलोचक को धड़कते जीवन से सीधे मुखातिब होना है, एक हाथ जीवन की नब्ज पर रखकर दूसरे हाथ से जीवन को प्रतिबिम्बित करती रचनाओं की नब्ज को टटोलना है। उसका दायित्व दोहरा और चुनौती भरा है।
विमर्श का अर्थ है ‘जीवन्त बहस‘। साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो इसे ‘विचार का गहन विचार‘ और ‘सर्वस्व की प्राप्ति की आकांक्षा‘ कहा जा सकता है। अंग्रेजी में इसके लिये ‘डिस्कोर्स‘ शब्द का प्रयोग किया जाता है, अर्थात किसी भी समस्या या स्थिति को एक कोण से न देखकर भिन्न मानसिकताओं, दृष्टियों, संस्कारों और वैचारिक प्रतिबद्धताओं का समाहार करते हुए उलट-पलट कर देखना, उसे समग्रता से समझने की कोशिश करना और फिर मानवीय संदर्भों में निष्कर्ष प्राप्ति की चेष्टा करना या दूसरे शब्दों में किसी विषय पर अभी तक जो लेखन या विचार होता आया है, उस पर पुनः विचार कर उसकी दशा का मूल्यांकन करना ही विमर्श के अन्तर्गत आता है।
हिन्दी साहित्य में नारी विमर्श की जड़ें हम अत्यन्त प्राचीन काल से पाते हैं। ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी‘ अर्द्धाली लिखने वाले बाबा तुलसीदास को भी कुछ स्त्रियों की प्रशंसा करनी पड़ी थी।
नारी विमर्श की भोर की खुमार भरी नींद तोड़ने के लिए ‘देवरानी जेठानी की कहानी‘ और ‘भाग्यवती‘ सरीखी-रचनाओं को निश्शंक भाव से प्रभात फेरियों का दर्जा दिया जा सकता है। समाज सुधार के सजग और सायास गढ़े उद्देश्य, पात्र, कथानक और घटनाओं से बुनी इन रचनाओं में राजा राममोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, रानाडे, महर्षि कर्वे, महर्षि दयानन्द तक के समाज सुधार आंदोलन की परम्परा, अनुगूंज और छाप साफ दिखाई पड़ती है। बाल विवाह विरोध, विधवा विवाह समर्थन, स्त्री शिक्षा आदि इनके प्रमुख विषय थे।
सन् 1760 ई0 में विद्यासागर बहुत ही मशक्कत के बाद कानूनी तौर पर लड़कियों के लिये विवाह की न्यूनतम आयु दस वर्ष करा पाये थे। सन् 1829 ई0 में बहुतेरे प्रयासों के बाद यह आयु बढ़ाकर तेरह वर्ष ही हो पाई थी। अठारह वर्ष न्यूनतम आयु का प्रावधान शारदा ऐक्ट 1856 ई0 के बाद ही सम्भव हो पाया था, जबकि ‘भाग्यवती‘ में श्रद्धाराम फिल्लौरी पं. उमादत्त के जरिये लड़के और लड़की के विवाह की न्यूनतम आयु क्रमशः अठारह और ग्यारह वर्ष का संदेश देकर वक्त से थोड़ा आगे चलने का संकेत देते हैं।
सदी का वर्क बदलने का हिन्दी साहित्य में उभर कर आने वाला स्त्री-विमर्श इतना जड़, उपदेशात्मक और इकहरा नहीं रह गया था। लेकिन यह भी तय है कि उसका रेखांकन अब भी पुरूष और परिवार के सन्दर्भ में ही किया जाता था। इसकी प्रमुख वजह थी सामाजिक-राजनीतिक जीवन में पुरूष नायकों के साथ स्त्रियों की प्रत्यक्ष भागीदारी। प्रारम्भ में समाज सुधारकों के परिवारों की स्त्रियाँ प्रादेशिक स्तर पर आम जनता के उद्बोधन का मंत्र फूंकने हेतु आगे बढ़ाई गई थीं, वक्त के साथ उन्होंने दो उल्लेखनीय कार्य किये। प्रथम, उन्होंने वैयक्तिक तौर पर परिवार के पुरूष अनुशासन, दिशा निर्देशन से मुक्त हो स्वायत्त सत्ता महसूस की। दूसरे, अपनी आवाज को संगठित कर उसे अखिल भारतीय पहचान देने की कोशिश की। सन् 1897 ई0 में ‘वीमेंस इंडियन एसोसियेशन‘ की स्थापना, सन् 1925 ई0 में ‘नेशनल काउंसिल ऑफ वीमेन इन इंडिया‘ की स्थापना और सन् 1927 ई0 में ‘अखिल भारतीय महिला परिषद‘ का अस्तित्व में आना अपने आप में ऐतिहासिक और क्रान्तिकारी घटनायें थीं, जिनकी अनुगूंज आज भी स्वतंत्र भारत के संविधान और कानून में सुनी जा सकती है। सन् 1946 ई0 में ‘अखिल भारतीय महिला परिषद्‘ द्वारा प्रस्तुत अधिकारों और कर्तव्यों के चार्टर में वर्णित कुछ मांगों को भारतीय संविधान में ज्यों का त्यों स्थान दिया गया। जैसे धारा 44 के अन्तर्गत लिंग, जाति धर्म के आधार पर सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक क्षेत्र में भेदभाव न किया जाना। धारा 16 के अन्तर्गत लिंग, जाति, धर्म के आधार पर सरकारी नौकरियों और दफ्तरों में भेदभाव न किया जाना। इसने स्त्री को अपनी चिरपोषित ‘अबला‘ छवि को तोड़कर एक नये जुझारू व्यक्तित्व और रचनाशील भूमिका में आविर्भूत होने के लिये प्रेरित किया। सामाजिक उथल-पुथल के इस दौर में हिन्दी कथा साहित्य भी नारी स्वायत्तता और स्वतंत्र चेतना को शिद्दत से चित्रित करता रहा। लेकिन विडम्बना यह रही कि इस बिन्दु पर आकर लेखक निर्वैयक्तिक नहीं रह पाया। उसका पुरूष अहं या संस्कार, जो भी कहें स्त्री की इस आत्मनिर्भर विचारवान संघर्षशील छवि को स्वीकार नहीं पाया।


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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

October 22, 2013

नारी जीवन की विडंबना को लेकर बहुत सही लिखा है आपने .

ranjanagupta के द्वारा
October 22, 2013

पुनीत जी विभिन्न कोणों से स्त्री विमर्श की सार्थक सामीक्षा हेतु ,इस ब्लाग पर प्रायः अच्छे लेख प्रतिक्रिया को तरस जाते है ,कोई बात नहीं अपनी अपनी सीमाए है धन्यवाद!!!


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